Showing posts with label Pen. Show all posts
Showing posts with label Pen. Show all posts

Thursday, 8 January 2015

ज़िन्दगी से हटके

धुंधले से साये हैं इर्द गिर्द भटकते
और कुछ  किताबों के फटे पन्ने
एक कहानी लिखी थी कभी मैंने
जो ज़िन्दगी से मुखातिब थी
पर फिर भी मुसलसल अलग
सियाही  की जगह खून था दिल के मेरे
और रंग आसमानों की सी थी
शायद चुराई हुई
फीके पड़  गए  जैसे ही धोया मैंने
अश्कों से बारहा तंग आकर


अब कोरे से काग़ज़ पर फिर सींचती हूँ
इक नज़्म, जो साज़ो-आवाज़ से जुदा है
सिसकियों सी सुनाई पड़ती है
तन्हाई के शोरोगुल में


यह इक अजीब दास्ताँ है जनाब
कहते हैं पढ़नेवाले
लिखने वाले ने दिल खोल के रख
दिया हो जैंसे सामने सबके
पर फिर भी आईने में अक्स
नज़र नहीं आता
मानो काग़ज़ के पन्नो में
कहीं बस गया है जाकर


इक कहानी लिखी थी मैंने कभी
जो ज़िन्दगी से मुख्तलिफ थी
पर फिर भी न जाने क्यों लगता है
बहुत जानी पहचानी सी किसी मरहूम की
आप बीती हो मालुम 



Saturday, 19 May 2012

Confession

কিছু  আঁকাবাঁকা রেখা 
কলম  যে শোনে  না কথা 
আর  এই যে নীলের  আঁচড়  
শূন্যের  বুক  চিড়ে  নেমে গেছে 
উদ্যেশ্য  বিহীন  দিগন্তের  পাণে 
ও  কিছু নয় 
শুধু খামখেয়ালিপনা মাত্র 

A few stray lines
My pen goes awry
The blue gash down the blank page
Is just an afterthought..