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Tuesday, 10 May 2022

एहसास







खरोंच हल्की 
या ज़खम  गहरा
चोट तो है  न ?

ख़ामोशी से या
मुस्का के सहलाओ
दर्द तो है न ?

जीये नहीं  ..अभी कहाँ
साँसों  में वो  
तड़पन तो है न ?

धुआं है .. लकीरें सारी 
अंगारों में 
ठिठुरन  तो हैं न  ?

ख्वाबों को रौंद चला 
पलकों तले 
चुभन तो है न ?

वक़्त अभी - थोड़ी बाकी 
धड़कनों में 
सुलगन तो है न ?



खरोंच हल्की 
या ज़खम  गहरा
चोट तो है  न ?

ख़ामोशी से या
मुस्का के सहलाओ
दर्द तो है न ?





Sunday, 26 March 2017

ज्वाला



जलती आग
शिकस्तों पे चोट
मेरी बिंदिया 

Wednesday, 8 February 2017

खुली खिड़की

खिड़की खोलते ही
इक मुट्ठी  आसमां  का झलक
जिसका नीलापन कुछ फीका सा पढ़ गया है
सुफ़ैद  रुई से कुछ बादल
ठहरते नहीं.... बह जाने की ताकीद में
दूर दूर तक नज़र न आते
ऐसे एक-दो पंख फड़फड़ाते हुए पंछी
मीलो-मील उड़ान भरने की कोशिश में
एक टहनी  हरा दुपट्टा ओढ़े
सुनहरे चूड़ियों के गोलाइयाँ  खानकातीं
आँखें चौन्धियाते हुए रोशनी के  झुरमुठ
उस पे झोंका एक परदेसी सा अजनबी दहलीज़ों के खुशबू लिए
और एक बचपन खोया सा

कभी कभी सोचती हूँ
क्या सबकी खिंड़कीयाँ खुलते हैं
आसमान के सतह पर?
वह सब्ज़ीवाला जो चढ़ती धुप में
आवाज़ें लगाता है दरवाज़े पर
"सब्ज़ी  लेलो........ !"
वह पागल जो ट्रैफिक सिग्नल पर
सर खुजाता है और ज़ोर-ज़ोर से हँसता है
अपने ही अनकही चुटकुलों पर
और नहीं तो वह रिक्शावाला
जो देखते ही नमस्ते करता है
कोई बता रहा था हाल ही में
उसने अपनी  बहन की शादी कराई है
मार्किट से चौड़े ब्याज पे  क़र्ज़ें  लेकर

क्या इनके भी खिड़कियाँ खुलते है
आसमान के सतह पर ?
या इक झलक आसमान की
तलाश में कट जाती है पूरी ज़िन्दगी ?
सूखे सपनों को पसीनों में  फिसल जाते देख
अरे ! इनके बंजर घरों में खिड़कियाँ हैं भी या नहीं ?
या बसर करते होंगे ईंट पत्थरों के ढेर पर
और राख होते देखते होंगे सुलगते रोटियों को
पूछिये तो इनसे खिड़कियाँ देखी  है कभी?
जिसके साये में हम बैठ लिखते है
सच्ची-झूठी मनगढंत कहानियाँ...... ?

पता नहीं

शायद ......

उनकी खिड़कियाँ ??????????????????????








Sunday, 20 March 2016

ध्वनि



गूगल से 


शब्दों से परे 
सचकित सशब्द 
ये अंतराल 

Monday, 29 February 2016

खामोशियाँ


गूगल से 


वो बातें बिन बोले भी बयाँ  होती है 
जिन्हें कहते खामोशियाँ  जवाँ होती  है 

प्रदूषण और परिवहन

(Inspired by Delhi Chief Minister Shri Arvind Kejriwal's drive to free the Capital of pollution)





गूगल से   चित्र 


प्रदूषण  पे 
रोक, राह तकता  
खड़ा लंगड़ा