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Tuesday, 10 May 2022

एहसास







खरोंच हल्की 
या ज़खम  गहरा
चोट तो है  न ?

ख़ामोशी से या
मुस्का के सहलाओ
दर्द तो है न ?

जीये नहीं  ..अभी कहाँ
साँसों  में वो  
तड़पन तो है न ?

धुआं है .. लकीरें सारी 
अंगारों में 
ठिठुरन  तो हैं न  ?

ख्वाबों को रौंद चला 
पलकों तले 
चुभन तो है न ?

वक़्त अभी - थोड़ी बाकी 
धड़कनों में 
सुलगन तो है न ?



खरोंच हल्की 
या ज़खम  गहरा
चोट तो है  न ?

ख़ामोशी से या
मुस्का के सहलाओ
दर्द तो है न ?





Saturday, 12 September 2015

निर्बोध

पता नहीं ये  हर पल की कश्मकश कहाँ ले जायेगी ? ये धूप  छाओं की पेचीदगी, परेशान सा आलम। और उनका मुझपर  रहम-ओ-क़रम । ख़ाक में मिल जाने का दिल करता है। बचपन में एक ग़ज़ल सुनते थे रेडियो पर - ग़ैरफ़िल्मी । तब उन अल्फ़ाज़ों के मतलब समझ नहीं आते  थे । अब जब थोड़ी थोड़ी समझने लगी हूँ तो छटपटाती हूँ। बोल कुछ इस प्रकार थे (अब इतने सालों बाद कोई ग़लती कर रही हूँ या नहीं; पर शब्द जो भी हो भावनाएं वही है जो कहना चाहती हूँ )

एहले खिरज तुम भी क्या जानो इनकी भी मजबूरी हैं 
ईश्क़ में कुछ पागल सा होना शायद बहुत ज़रूरी है  


ये खिरज साहब भी तजुर्बेकार शायर मालूम पढ़ते  हैं। कैसे, दीवानगी बोलो या बेचारगी कहो, दिल की उलझनों  को अपने शेर के मायाजाल में आबद्ध कर  लिया हँसते- हँसते।  जीवन इसी उलझन का नाम हैं शायद - पाना न पाना, पाके खो देना, खो के खोने का दू:ख और दू:ख में सुख ढूंढना और इन्हीं  नामुराद कोशिशों  में दिन गुज़ारना ।  यही  माया है -

सन्यासी भटके
दर-ब-दर
पारस मणी की
तलाश कर
जब लगा हाथ, पर
त्याग दिया
जान पत्थर

हमें  रहती है ता-उम्र  जिसकी आस  जब वह हाथ लग जाता है तब  हमें वो गवारा नहीं होता। हम उससे पीछा  छुड़ाने के मौके खोजते हैं और जब वह हाथ से निकल जाता है तो ज़ार-ज़ार उसीकी याद में आंसू बहाते हैं, बिलखते हैं, तड़पते हैं। यही  विडम्बना ही जीवन की मूल व्यथा-सार है। मनुष्य की  निर्बुद्धिता - अपने आप को ही न समझ पाना और तभी अपने आप में ही उलझे रहना ।   

कट्टी थी कल  
मिलने उसे ही मैं 
आज बेकल